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सर्द ऋतु ने पैर पसारे (contest)

Posted On: 16 Jan, 2014 Others,कविता में

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सर्द ऋतु ने पैर पसारे ।
* * * *
- – - – - – - – - – - -
पास पास मिल बैठें साथी
सर्द ऋतु ने पैर पसारे ।
- – - – - – - – - – - -
जीवन की गति मंद पड़ गई,
फिर भी मन भागा ही जाए ।
उठापटक की दुनियादारी,
खुशिओं को बिखराती जाएं ।
बहुत हो गई जग की बातेँ,
थोड़ा अपना घर भी सँवारें ।
- – - – - – - – - – - -
पास पास मिल बैठें साथी,
सर्द ऋतु ने पाँव पसारे ।
- – - – - – - – - – - -
सघन धुँध की चादर ओढ़े
धरती भी अब दुबकी जाए ।
पर्वत घाटी वृक्ष लताएं,
आँखोँ से ओझल हो जाएं ।
फिर भी जीवन गति मेँ रहता,
रुकती नहीँ कभी पतवारेँ ।
- – - – - – - – - – - -
पास पास मिल बैठें साथी,
सर्द ऋतु ने पैर पसारे ।
- – - – - – - – - – - –
प्राची से सूरज की किरणेँ,
भू तल पर जब फैली जाएं ।
अंधेरी रातोँ की ठण्डक ,
से जीवन कुछ राहत पाएं ।
छोड़ घोंसला पाखी भी अब,
दूर गगन की ओर निहारेँ ।
- – - – - – - – - – - -
पास पास मिल बैठें साथी
सर्द ऋतु ने पैर पसारे ।
- – - – - – - – - – - -
- सुरेन्द्रपाल वैद्य,



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16 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
January 26, 2014

गहराती शरद ऋतु की सुन्दर झाँकी प्रस्तुति की है साथ ही दुनियादारी से जोड़कर आप ने जिदगी की जीवंतता को भी दरशाया है !बधाई !

    vaidya surenderpal के द्वारा
    January 26, 2014

    उत्साहवर्धन करते सुन्दर शब्दों के लिये आपका हार्दिक आभार, आचार्य विजय गुंजन जी।

yogi sarswat के द्वारा
January 22, 2014

सघन धुँध की चादर ओढ़े धरती भी अब दुबकी जाए । पर्वत घाटी वृक्ष लताएं, आँखोँ से ओझल हो जाएं । फिर भी जीवन गति मेँ रहता, रुकती नहीँ कभी पतवारेँ । – – – – – – – – – – – - पास पास मिल बैठें साथी, सर्द ऋतु ने पैर पसारे । खूबसूरत शब्द ! yogi-saraswat.blogspot.in

    vaidya surenderpal के द्वारा
    January 22, 2014

     योगी सारस्वत जी, गीत के विषय में आपकी उत्साहजनक प्रतिक्रिया के लिए बहूत आभारी हुँ

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
January 18, 2014

सुन्दर व् सामयिक प्रस्तुति .बधाई

    vaidya surenderpal के द्वारा
    January 22, 2014

    सुन्दर व सार्थक प्रतिक्रिया के लिये आपका आभार शिखा कौशिक जी।

alkargupta1 के द्वारा
January 18, 2014

शीत ऋतु से सम्बंधित अति सुन्दर कृति

    vaidya surenderpal के द्वारा
    January 22, 2014

    सुन्दर प्रतिक्रिया के लिये आपका हार्दिक धन्यवाद अलका गुप्ता जी।

nishamittal के द्वारा
January 18, 2014

शीत के प्रकोप पर सुन्दर रचना सुरेन्द्र जी

    vaidya surenderpal के द्वारा
    January 18, 2014

    आपकी सार्थक प्रतिक्रिया के लिए आभारी हुँ निशा मित्तल जी।

jlsingh के द्वारा
January 18, 2014

सघन धुँध की चादर ओढ़े धरती भी अब दुबकी जाए । पर्वत घाटी वृक्ष लताएं, आँखोँ से ओझल हो जाएं । फिर भी जीवन गति मेँ रहता, रुकती नहीँ कभी पतवारेँ । सुन्दर पंक्तियाँ आदरणीय सुरेन्द्रपाल वैद्य,जी!

    vaidya surenderpal के द्वारा
    January 18, 2014

    आपका हृदय से धन्यवाद, जवाहर लाल जी।

Santlal Karun के द्वारा
January 16, 2014

अत्यधिक शीत पर आधारित ऋतु-गीत, पठनीय, संवेद्य एवं प्रभावी ; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

    vaidya surenderpal के द्वारा
    January 16, 2014

    आ. सन्तलाल करुन जी, गीत के विषय में आपकी उत्साहजनक प्रतिक्रिया के लिए बहूत आभारी हुँ।

January 16, 2014

bahut sahi v sundar prastuti .

    vaidya surenderpal के द्वारा
    January 16, 2014

    आपका हृदय से आभारी हुँ शालिनी कौशिक जी।


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