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जिस मोड़ पर (contest)

Posted On: 19 Jan, 2014 Others,कविता,Contest में

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*जिस मोड़ पर*
——————-

वो हमें जिस मोड़ पर मिलते रहे हैं,
घाव दिल के फिर हरे करते रहे हैं।
.
फासले ही जब हकीकत बन गये हैं,
तब हवा में पुल सदा ढहते रहे हैं।
.
है बहुत छोटी मगर ये जिंदगानी,
हौंसले तो रोज ही बढ़ते रहे हैं।
.
पंख हैं फौलाद के जिन पंछियों के,
वो समंदर पार ही करते रहे हैं।
.
आसमां से टूटते हैं जो सितारे,
प्रेमियों को वो सदा भाते रहे हैं।
.
बीज जो मिट्टी तले ही सो गये थे,
पेड़ बनकर वो सदा फलते रहे हैं।
.
प्यास वे बादल बुझा सकते नहीं हैं,
जो गरजकर ही सदा उड़ते रहे हैं।
——————-
-सुरेन्द्रपाल वैद्य।



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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 20, 2014

फासले ही जब हकीक़त बन गए हैं ,तो हवा में पुल सदा ढहते रहे हैं , आदरणीय वैधजी ,मुझे ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं .बहुत आभार , सादर निर्मल

    vaidya surenderpal के द्वारा
    February 21, 2014

    आपका हृदय से आभारी हुँ निर्मला सिंह जी।

alkargupta1 के द्वारा
January 24, 2014

बहुत सुन्दर प्रस्तुति श्री वैद्य सुरेन्द्र पाल जी

    vaidya surenderpal के द्वारा
    January 24, 2014

    हृदय से आभार आपका अलका गुप्ता जी।

ranjanagupta के द्वारा
January 24, 2014

बहुत सुन्दर रचना सुरेन्द्र पाल जी !बहुत बहुत बधाई !शब्दों का चयन मनोमुग्ध कारी !

    vaidya surenderpal के द्वारा
    January 24, 2014

    सुन्दर प्रतिक्रिया के लिये आपका हार्दिक धन्यवाद रंजना गुप्ता जी।

ikshit के द्वारा
January 20, 2014

Mast-m-Mast

nishamittal के द्वारा
January 20, 2014

बहुत सुन्दर सुरेन्द्र पाल जी

    vaidya surenderpal के द्वारा
    January 20, 2014

    आपका हृदय से आभारी हुँ निशा मित्तल जी।

jlsingh के द्वारा
January 19, 2014

बीज जो मिट्टी तले ही सो गये थे, पेड़ बनकर वो सदा फलते रहे हैं। बहुत सुन्दर आदरणीय सुरेन्द्र पाल वैद्य जी!

    vaidya surenderpal के द्वारा
    January 20, 2014

    आपका हार्दिक धन्यवाद आ. जवाहर लाल जी।


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